लघु पाराशरी’ (पंडित सीताराम झा द्वारा व्याख्यायित)
महर्षि पाराशर के सिद्धांतों पर आधारित यह ग्रंथ मुख्य रूप से ग्रहों के ‘कारकाकारक’ (भाव-स्वामित्व के अनुसार शुभ-अशुभ) स्वभाव और ‘विंशोत्तरी दशा’ के फलित पर केंद्रित है।
लघु पाराशरी’ के मूलभूत सिद्धांतों का विस्तृत सारांश निम्नलिखित है:
१. संज्ञा अध्याय (ग्रहों का कार्यात्मक स्वभाव)
इस ग्रंथ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि ग्रह केवल अपने नैसर्गिक स्वभाव (शुभ या क्रूर) के आधार पर फल नहीं देते, अपितु कुंडली में उनके भाव-स्वामित्व का सर्वाधिक महत्व होता है।
त्रिकोणेश (१, ५, ९): त्रिकोण के स्वामी सदैव अत्यंत शुभ फलदायक होते हैं।
त्रिशडायेश (३, ६, ११): तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव के स्वामी सदैव अशुभ (पापी) फल देते हैं।
केन्द्रेश (१, ४, ७, १०): यदि नैसर्गिक शुभ ग्रह (जैसे गुरु, शुक्र, पूर्ण चंद्र, बुध) केन्द्र के स्वामी हों, तो वे अपना शुभत्व खो देते हैं (इसे केन्द्राधिपति दोष कहा जाता है)। इसके विपरीत, यदि नैसर्गिक पाप ग्रह (जैसे शनि, मंगल, सूर्य) केन्द्र के स्वामी हों, तो वे अपना क्रूर स्वभाव त्याग देते हैं।
सम भाव (२, ८, १२): द्वितीय और द्वादश भाव के स्वामी तटस्थ होते हैं; वे जिस भाव में बैठते हैं या जिस ग्रह के साथ होते हैं, उसी के अनुरूप फल देते हैं। अष्टमेश (आठवें भाव का स्वामी) प्रायः अशुभ फल देता है, परंतु यदि वह लग्न का भी स्वामी हो (जैसे मेष या तुला लग्न में), तो वह अशुभ नहीं रहता।
२. योग अध्याय (राजयोग विचार)
लघु पाराशरी ग्रहों के संबंधों से बनने वाले राजयोगों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है:
राजयोग: जब किसी केन्द्रपति (केन्द्र का स्वामी) और त्रिकोणपति (त्रिकोण का स्वामी) का परस्पर संबंध होता है—चाहे वह युति (एक साथ बैठना), दृष्टि (एक-दूसरे को देखना) या स्थान परिवर्तन (एक-दूसरे की राशि में बैठना) हो—तो यह अत्यंत प्रबल और शुभ ‘राजयोग’ का निर्माण करता है।
राहु-केतु का प्रभाव: यदि छाया ग्रह राहु या केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित होकर त्रिकोणेश या केन्द्रेश के साथ संबंध बनाएं, तो वे भी अपनी दशा-अंतर्दशा में उत्तम राजयोग के समान शुभ फल प्रदान करते हैं।
३. आयुर्दाय व मारक अध्याय
आयु और मृत्यु तुल्य कष्ट का विचार मारकेश के सिद्धांत पर आधारित है:
अष्टम भाव और अष्टम से अष्टम अर्थात् तृतीय भाव, जीवन (आयु) के स्थान हैं।
इन आयु स्थानों से बारहवें (व्यय) भाव अर्थात् द्वितीय और सप्तम भाव ‘मारक स्थान’ कहलाते हैं, और इनके स्वामियों को ‘मारकेश’ कहा जाता है।
मारकेश की महादशा या अंतर्दशा में जातक को शारीरिक कष्ट, रोग या मृत्यु तुल्य कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।
४. दशा-फल अध्याय (विंशोत्तरी दशा विचार)
दशाओं का फलित करते समय ग्रहों के बलाबल और उनके परस्पर संबंधों का विचार अनिवार्य है:
ग्रह अपनी महादशा और अंतर्दशा में अपने भाव-स्वामित्व और अन्य ग्रहों के साथ बने योगों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
यदि किसी राजयोग कारक ग्रह की महादशा चल रही हो और उसमें किसी मारक या पापी ग्रह की अंतर्दशा आए (और उनके बीच परस्पर कोई संबंध न हो), तो भी राजयोग कारक ग्रह अपने शुभत्व की रक्षा करता है और अशुभ फल को हावी नहीं होने देता।


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